#अच्छाई और बुराई
#जड़त्व और गतिशीलता का संघर्ष
भारत में जैसे ही कोई पर्व – दसहरा, होली, दीवाली, आदि आती है तो अक्सर हम लोग ये मेसेज एक दुसरे को देते हैं – ‘ये अच्छाई पर बुराई की जीत का पर्व है’, ये ‘शुभ का अशुभ पर विजय होने का त्यौहार है’, इत्यादि; लेकिन ये कभी नहीं सोचते कि इस विजय के बावजूद अच्छाई और बुराई हमेशा बचे कैसे रहते हैं; दुसरे शब्दों में विजय के बाद भी ये संघर्ष हमेशा चलता ही रहता है, कभी खत्म नहीं होता|
अक्सर हम बात करते समय ये बोलते हैं – ‘अमुक विचार/वस्तु/व्यक्ति अच्छा या बुरा है या शुभ या अशुभ है’| अपनी इच्छित या अनिच्छित “विचार/वस्तु/व्यक्ति” की प्राप्ति या अप्राप्ति पर इस प्रकार का अनुभव साधारणतया सबको होती है, लेकिन अनेक बार हमें स्वयं ये निर्णय लेने में कठिनाई होती है कि ये “विचार/वस्तु/व्यक्ति” हमारे लिय इस देश-काल में अच्छा है या बुरा | उसका कारण ये है कि हमारे अनेक इच्छाओं का एक साथ प्रकट होना और उन इच्छाओं में भी परस्पर विरोध होना | जैसे- अमुक भोज्य हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है इसलिए इसे ग्रहण न करें लेकिन उस देश-काल में उस भोज्य के प्रति उस स्वाद की स्मृति जिससे हम कभी आनन्दित हुए हों, वो हमें उसे ग्रहण करने के लिए आकर्षित करता है; और तब हमारे स्वयं के मष्तिष्क में दो इच्छाओं का एक संघर्ष प्रारम्भ होता है, उस संघर्ष में जिस इच्छा की विजय हो, वो इच्छा उस कार्य को अच्छा कहेगा और जिस इच्छा की पूर्ति न हो, वो इसे बुरा कहेगा|
स्वयं के भीतर चलने वाली इच्छाओं के इस संघर्ष में “अच्छ” या “बुरा” कहना आसान नहीं होता लेकिन यदि ऐसा कुछ कोई दुसरा व्यक्ति करता हुआ नजर आये तो ये निर्णय बहुत आसन होता है; इसके बावजूद अनेक बार एक देश-काल में निर्णित “अच्छ” या “बुरा” दुसरे देश-काल में बिलकुल बदल भी सकता है; और ऐसा हम सबने अनेकों बार देखा या अनुभव किया है| इसके बावजूद हम किसी एक “विचार/वस्तु/व्यक्ति” के विषय में केवल एक “अच्छ” या “बुरा” होने की धारणा कैसे और क्यों बना लेते हैं? क्या ये आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए?
भौतिक विज्ञान का एक सिद्धांत है – “जडत्व” यानि “कोई वस्तु अपनी स्थिरता या गति की अवस्था का त्याग तब तक नहीं करता जब तक उस पर कोई बाहरी बल नहीं कार्य करता”| प्रश्न यह है कि क्या यही सिद्धांत “विचार” और “इच्छा” पर भी कार्य करता है| भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों में, गति या स्थिरता में “सतत परिवर्तन” भी एक मूल सिद्धांत ही है, तो वास्तव में ‘जडत्व’ और ‘परिवर्तन’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं | डार्विन के उत्तरजीविता सिद्धांत में जिस “दो जातिओं के संगर्ष” का प्रारूप है , वो वास्तव में “इच्छाओं के संघर्ष” की कहानी ही है| डार्विन के इस सिद्धांत के मुताबिक़ आज संसार में केवल एक ही प्रजाति, जो सबसे सशक्त हो, को जीवित रहना चाहिए था, लेकिन व्यवहार में ऐसा बिलकुल ही नहीं दिखता है| सम्भवत: डार्विन ये नहीं समझ पाए की कोई भी एक इच्छा सार्वभौम नहीं है और इसलिए इच्छाओं के संघर्ष में जैसे केवल एक इच्छा ही नहीं बच जाती, बल्कि सारी इच्छाएं बची रहती हैं; वैसे ही, अंत में केवल एक ही प्रजाति नहीं बचती बल्कि सारी प्रजातियाँ बची रहती हैं| एक समय में एक इच्छा के न होने का यह अर्थ कत्तई नहीं कि वह इच्छा जड़-मूल से समाप्त हो गई है, बल्कि उस इच्छा में दुसरी इच्छा के कारण एक विराम की अवस्था आई है, जो वास्तव में केवल एक उपयुक्त देश-काल में पुन: प्रकट होगा| इच्छा भी प्रकृति का अंश है, अत: एक देश-काल में प्रकट होना या विलुप्त होना स्वाभाविक है, इसलिए उसका सर्वनाश होना सम्भव नहीं है| हाँ, हमारा मष्तिष्क उस इच्छा के साथ हो या अलग हो, ये हम अवश्य निर्धारित कर सकते हैं| जैसे इंटरनेट के सर्वर पर सूचनाएँ नष्ट नहीं होतीं, चाहे हम उससे जुड़े हों या नहीं; हाँ, मेरा कम्पुटर उससे जुड़े या नहीं, हम ये निर्धारित कर सकते हैं| आहार, निद्रा, मैथुन आदि इच्छाएं मूल रूप से हमारे प्रकृति के सर्वर पर हैं, हम कब, क्यों या कैसे, जाने या अनजाने जुड जाते हैं, पता भी नहीं चलता|
सार्वभौमिक रूप से कोई भी इच्छा अच्छी/शुभ या बुरी/अशुभ नहीं होती बल्कि उसका अच्छा या बुरा होना देश, काल और पात्र के आधार पर तय होता है| इसीलिए कर्म का भी शुभ या अशुभ होना देश-काल-पात्र के आधार पर ही तय होता है, क्योंकि इच्छा ही कर्मों को भी तय करती है|
JITENDRA K RAI / DOP: 30/12/2022
