Agenda of the week
“Educational Reforms in India”
Article/View – 1
Devendra pratap singh/ Email: devps123@gmail.com
रोजगारपरक शिक्षा आज की बुनियादी आवश्यकता है। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आजादी के बाद से अबतक इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीँ हुआ।आज भारत विश्व के सबसे अधिक युवाओं वाला देश है।यदि हम सचेत नही हुए तो इस जनसांख्यिकीय लाभांश का जनसांख्यिकीय आपदा में बदलना तय है।किया क्या जाय? यह यक्ष प्रश्न है जिसपर हमे विमर्श करना है।हमने महसूस किया है कि सरकार के कौशल विकास की योजना अपना अभीष्ट पाने में सफल नहीँ रही है।उद्योग जगत को वांछित कुशल श्रम नहीं मिल रहा है।उद्योगों में लगे करोड़ो अर्ध कुशल श्रमिकों से उद्पादकता प्रभावित हो रही है और यह राष्ट्रिय क्षति है।
एक तरफ बेरोजगारी दूसरी तरफ उद्योगों के कौशल माँग पूर्ति का विनाशकारी असंतुलन।एक तरफ हाईस्कूल इंटरमीडिएट के बाद पढ़ाई छोड़ने का बढ़ता छात्र दर तो दूसरी तरफ लचर शिक्षा व्यवस्था। बढ़ता और बंटता परिवार, जोतों का घटता आकार और उसपर से कृषि क्षेत्र में अवांछित बेरोजगारी का अतिशय भार। हमारे आंतरिक ब्यवस्था की चूलें हिल रही है।
हर वस्तु के हिलने की अपनी आबृत्ति (frequency) होती है और हर आबृत्ति में समाहित होती है एक निश्चित ऊर्जा (energy=hn)।आंतरिक ब्यवस्था की हिलती चूलों की आबृत्ति बढ़ती जा रही है लिहाजा विध्वंशक ऊर्जा भी बढ़ रही है। अर्थ शास्त्रीय विज्ञानं ने बेरोजगार जनित इस ऊर्जा की कोई क्रांतिक सीमा ( critical limit ) निर्धारित की है या नही , पर गांवों में भ्रमड़ और सामान्यज्ञान से इसकी भयावहता महसूस की जा सकती है।
समश्या है तो समाधान भी होगा ही।यह आशावादी दृष्टिकोण कुछ सोचने को विवश करता है। जब भी और जितना भी सोचा जाय हमारे चिंतन की केंद्र में हमारी शिक्षा ब्यवस्था ही होगी। जिसे आमूल परिवर्तन की दरकार है।जो बचपना छिन रही है जवानी खा जा रही है पर सम्मान्यतया दो जून की रोटी की जुगाड़ कराने में विफल है।
संवेदनशील सरकारेँ स्पष्ट , सम्यक व दूर दृष्टि से शिक्षा ब्यवस्था में बदलाव की दिशा में काम कर रही होंगीं। जिसके परिणामी प्रभाव के आकलन में लंबा वक्त लगना लाज़मी हो सकता है।तो क्या हमें तब तक मूक दर्शक रहना होगा ? नहीं।मेरा मत है कि हमें तब तक दो दिशा में प्रयास आरम्भ कर देना होगा। पहला है – सघन करियर मार्गदर्शन। यह सरकार का सभ्य समाज का हमारा आपका हम सबका यह प्रयास होना चाहिए कि हर छात्र अपने अभिरुचि के अनुरूप ही अपना करियर लक्ष्य बना सके।हर छात्र अपना करियर च्वायस के आधार पर निर्धारित कर सके न की चान्स के आधार पर।इसके लिए विद्यालयों को अंधी ब्यवसायिक प्रबृत्ति पर थोड़ा विराम लगाना होगा।गुमराह न कर सटीक करियर मार्गदर्शन कर सही पाठ्यक्रम में प्रवेश लेना होगा। इंडस्ट्री से यदि संपर्क व समन्यवय हो सके तो अच्छा होगा।इंडस्ट्री को भी दिल बड़ा करना होगा।दूरस्थ विद्यालयों महाविद्यालयों तक अपनी आवश्यकताओं को पहुचाना होगा। वहाँ अपनी कौशल आवश्यकता की एक नर्सरी लगाने का विचार आजाय तो मजा आजाय।
दूसरा – जापान जर्मनी जैसे देशों से प्रेरणा ले अधिकाधिक अप्रेंटिश के अवसरों को बढ़ाया जाय।इंडस्ट्री को अपनी परेशानियों का घड़ियाली आँसू बहाना बंद कर देश की युवा की आवश्यकता समझते हुए मिशन मोड़ से आगे आना होगा।विद्यालय भी ऐसे कार्यक्रमों को अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा बना ले तो सोने पे सुहागा होगा।सरकारी अर्धसरकारी निजी सभी संस्थाएं अप्रेंटिश के अवसर उपलब्ध कराने में अभिरुचि दिखाएं और इस प्रकार हर युवा को कार्य संस्कृति को समझने का ब्यवहारिक अवसर प्रदान कर उसके करियर के प्रति आशावान बनाएं।

भारत में शैक्षणिक सुधारने अत्यन्त आवश्यक है। इस लेख में उल्लिखित बिन्दुओं पर गौर करते हुए कुछ अन्य तथ्यो को समाविष्ट करना प्रासंगिक होता है जिसमें रोजगारपरक शिक्षा के साथ जनसंख्या नियन्त्रण व सामाजिक समभाव के दृष्टिगत सरकार को नीति बना कर क्रियान्यवन करना महत्वपूर्ण है जो जनभागीदारी के बिना सम्भव शायद नहीं है।इस बात पर हम सभी सहमत होंगे छात्रों के रूचि के अनुसार चयनित क्षेत्रों में अग्रेसर शिक्षा हेतु मार्गदर्शन ,तकनीकी ज्ञान के उपरान्त अपरेन्टिस कर रोजगार के उपयुक्त अवसर सरकारों को तथा बड़ी छोटी कम्पनियों
को उपलब्ध कराना चाहिए ।देश के समग्र विकास में श्रम शक्ति का महत्व काफी हैं जिसे दो स्तरो में बाटा जा सकता है पहला मानसिक श्रम व दूसरा शारीरिक श्रम ।योग्यता के आधार पर दोनों श्रेणियों रोजगार उन्मुख छात्रों का विभाजन कर अवसर उपलब्ध कराना चाहिए ।
समाज के समग्र विकास के लिए प्राथमिक शिक्षा से ही जनसँख्या बृद्धि के दुष्परिणामो के बारे में जानकारी उपलब्ध कराना आवश्यक है कि कैसे बढ़ती भीड़ रोजगार के अवसर को कम करती है ,कुपोषण को बढ़ावा देती है ,पानी स्वास्थ्य ,भोजन ,मकान आदि समस्याओं को जन्म देने के साथ वर्ग संघर्ष को बढावा देती है ।
जागरूकता अभियानों के माध्यमों से शिक्षित करते हुए जनसंख्या का नियन्त्रण सम्भव है ।
एक यक्ष प्रश्न यह है कि आज समाज में शिक्षा को रोजगार का पर्याय मान लिया गया है जो कि अनुचित है ।यही वजह है कि बेरोजगारो की गिनती बढ़ती जा रही है ।शिक्षित होने का कतई मतलब नहीं होना चाहिये कि सरकारी या प्राइवेट नौकरी ही जीवन यापन का माध्यम है ।
शिक्षा का उपयोग स्वयं के व्यवसाय ,कृषि आदि में करके उन्नति किया जा सकता है ।आजकल प्रचलन ऐसा है कि शिक्षा प्राप्त व्यक्ति यदि नौकरी नहीं कर रहा है सामाजिक हीनता का शिकार होता है इससे बाहर आना होगा।इस दिशा में सामाजिक जनजागरण के साथ धार्मिक ,सामाजिक संगठनों व सरकार को मिल कर काम करना होगा ।
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