अहिंसा !!
# हत्या और आत्म-हत्या
# मृत्यु-दंड
# धर्म-युद्ध
#आतंकवाद
💐 JITENDRA K R /29.11.2018💐
अहिंसा , हिंसा के विपरीत अर्थ में है । यानि अहिंसा को समझने के पहले हिंसा को समझना आवश्यक है । हिंसा एक प्रकार का ऐसा विचार है जो दूसरे को कष्ट में डालने का उपाय है , और ये उपाय दूसरे के धन, ऊर्जा की हानि से लेकर दूसरे की जीवन-हानि यानि हत्या तक पहुँच जाता है ।
लेकिन हिंसा जब हत्या के रूप में प्रकट हो , तो उसकी एक परिणति आत्म-हत्या तक भी जाती है । सामान्यतः हिंसा का ये रूप जो हत्या को आत्म-हत्या तक पहुँचा देती है, कभी भी सामान्य नही माना जाता , और अनेकों समाजों ने इसे बीमारी का रूप दे रखा है । एक समय में आत्म-हत्या के लिये जिम्मेदार व्यक्ति, यदि आत्म-हत्या में असफल रहा हो तो, उसे राज्य के दण्ड का भागी होना पड़ता था (ये प्रावधान अब भारत में भी हटा दिया गया है, क्योंकि आत्म-हत्या की प्रवृति को मानसिक बीमारी मान लिया गया है )। लेकिन यही बात हत्या पर लागू नही है । हर आत्म-हत्या बीमारी है, पर ज्यादातर हत्याएं बीमारी नही मानी जाती, और उसके लिये राज्य मृत्यु-दंड तक दे सकता है ।
तो हत्या के लिये आवश्यक है कि एक पीड़क हो और दूसरा पीड़ित हो, यानि आत्म-पीड़क को हम बीमार कह कर छोड़ सकते / देते हैं (यह सही है या गलत, इसका विचार बाद में करते हैं)। लेकिन हिंसा की परिभाषा के हेतु, हिंसा हर स्तर पर होती है- शरीर, मन और समाज । दरअसल, हर हत्या एक प्रकार की आत्म-हत्या ही होती है । किसी भी हत्या के लिये पीड़क को अपने मानसिक जगत में स्वयं को पीड़ित ही करना होता है । इस विषय को समझने के लिये आवश्यक है कि हम स्वयं को केंद्र में रखें, यानि ये मानते हुए कि यदि हम पीड़क हैं तो क्या अनुभव करते हैं और पीड़ित हैं तो क्या और कैसा अनुभव करते हैं । जाहिर है, जब वाह्य जगत के लिये पीड़क बनते हैं तो भी मानसिक जगत में स्वयं को पीड़ित करते हैं ।
सामान्यतः हर व्यक्ति दूसरों को पीड़ा देने के पहले स्वयं को पीड़ित करता है । हिंसा का भाव सार्वभौम न होने के कारण हिंसक (हिंसा के ओहले और बाद में भी) एक भयानक मानसिक द्वंद्व से गुजरता है, जो खुद के लिये दुःख पैदा करता है । इसीलिये हिंसा सही है या गलत, ये समझने के लिये किसी नैय्यायिक की आवश्यकता नही होती । यही वो आधार है जब न्यायाधीश हिंसा को धर्म-विरूद्ध मानता है ।
हिंसा को धर्म-शास्त्रों व समाज में वही स्थान प्राप्त है जो हर बुराई या पाप को प्राप्त है । हिंसा के लिये क्रोध मानसिक कारण है । परन्तु हर हिंसा (हत्या) का कारण क्रोध ही नही होता , इसका कुछ अपवाद भी होता है । हिंसा का एक और वृहद सामाजिक रूप है – युद्ध । इसकी चर्चा आवश्यक इसलिय है क्योंकि युद्धों को धार्मिक संरक्षण प्राप्त है । फांसी जैसे कृत्य राज्य के धर्म-दण्ड का हिस्सा माना जाता है । इस विषय में पूरे विश्व में दो धड़े स्पष्ट रूप से हैं – एक न्यायवादी जो राज्य द्वारा मृत्यु-दण्ड या युद्ध को न्यायसंगत मानते हैं, और दूसरे मानवता-वादी जो हर प्रकार की हिंसा /हत्या को गलत मानते हैं । इन्ही दोनों धड़ों की एक गूंज भारत के दो धर्मों- बौद्ध/जैन धर्म और सनातन हिन्दू धर्म में दिखाई पड़ता है । जहां बौद्ध/जैन हर प्रकार की हत्या को हिंसा की श्रेणी में रखते हैं , लेकिन सनातन धर्म (हिन्दू) इसके विपरीत धर्म-युद्धों व अन्यायी को मृत्यु-दंड तक का भी विधान करता है ।
इसी द्वंद्व का एक विस्तार-पूर्ण चर्चा भ/गी में कृष्ण-अर्जुन के संवाद में व्यक्त है । हिन्दू देवी-देवताओं के स्वरूप में दण्ड या आयुध का होना इस बात का प्रतीक है कि हिन्दू मृत्यु-दंड या धर्म-युद्ध को न्यायसंगत मानते हैं ।
हालांकि इन दो धड़ों के आंतरिक चिंतन में कोई विशेष फर्क नही है । क्योंकि ये राज्य द्वारा निर्देशित हत्याएं , क्रोध पर आधारित न हो कर करूणा पर आधारित होती हैं । ठीक वैसे जैसे डॉक्टर बेकार या रोग-ग्रसित अंगों को शरीर से अलग करता है । तो “सम्पूर्ण अहिंसा” व्यवहारिक नही होने के कारण, उसे अपनाना सम्भव नही है । लेकिन यही हिंसा या धर्मयुद्ध व्यक्तिगत स्तर पर थोपना अन्यायपूर्ण है और इसके लिये अवतारी व्यक्तित्व होना आवश्यक है । क्योंकि अवतार द्वंद्व-जनित मानसिक कष्टों से ऊपर होते हैं व उन्हें संसार के नश्वरता का पूर्ण व समुचित ज्ञान होता है । लेकिन अवतारों के आड़ में युद्ध थोपने वाले धर्मयुद्ध नही बल्कि शुद्ध हिंसा करते हैं । वर्तमान में वैष्विक आतंकवाद, जिसे आतंकवादी धर्म-युद्ध का नाम देते हैं, एक खुला उदाहरण है समूहिक हत्या का। क्रमशः ….💐
💐JITENDRA K R /29.11.2018💐
