शिक्षा-सूत्र -5

सत्य और अहिंसा !!
# सत्य के कई रंग
# कुछ अपनी, कुछ उनकी कहानी ….
# खेल-खिलाड़ी और रंगमंच-अभिनेता !!!
# नैमित्तिक कर्म

💐 JITENDRA K R /16.11.2018💐

बचपन में लेखक का अपना अनुभव खेलों का तो कम रहा लेकिन अभिनय का जरूर रहा है । चाहे गांव में होने वाली रामलीला वो या स्कूल में होने वाला नाटक , कुछ विशेष अवसर मिला अभिनय का । सम्भवतः हर बार रोल बेहद सराहा गया । कहतें है – अभिनय या खेल दोनों के लिये अभिनेता या खिलाड़ी में एक आंतरिक प्रेरणा चाहिय होती है जिसके वजह से वे एक नई पहचान व ऊंचाई को छू पाते हैं । लेकिन लेखक के विश्विद्यालय में पहुँचते ही उसी अंतः प्रेरणा ने धर्म-दर्शन के अन्वेषण की तरफ मोड़ दिया । शायद पूरी जिंदगी ही जब नाटक लगने लगे तो सत्य खोजना भी आवश्यक है । मैं कौन हूँ ? की गूंज जब हर सांस में दिखने लगे तो उसका एक ही मार्ग बचता है – आत्म-साक्षात्कार के मार्ग का अनुसरण ! (हिंदू) धर्म और मोक्ष की नगरी काशी अपने पंडितों , विद्वानों, कलाकारों के अलावा गुह्य- विद्याओं के जानकारों के लिये प्रसिद्ध रहा है । शायद इसी धरती की प्रेरणा ने शुद्ध आत्म-ज्ञान की प्रेरणा दी होगी । ये बात कवित्व वाली नही है, बल्कि एक ठोस अनुभव का है जो शायद अब विरले लोग काशी में महसूस कर पाते होंगे । हिन्दू विश्विद्यालय की लाइब्रेरी तब कुलगीत के अनुरूप लगती थी – सर्व-विद्या की राजधानी ! लाखो किताबें, उनमें बिखरे ज्ञान/ सूचनाएं , लगता था सब पी जाने का सुयोग प्रदान कर रहा है । लेकिन ….इस अनुभव की गाथा को यहीं रोकते हुए, वो बताते हैं जिसके लिये ये लेख है ।

तो अभिनय की मनोदशा से निकलकर , जीवन के अंत -मृत्यु के भय ने उस सत्य को जानने के लिये प्रेरित किया जो अभिनय से बिल्कुल अलग था । दुःख और भय, वो मूल कारण है जो सुरक्षा की ओर भागने पर मजबूर करते हैं । और सबसे बड़ी सुरक्षा ज्ञान है । लेकिन अभिनय एक गजब की विधा है जहां कलाकार अपने स्वयं के वजूद को भूलकर हमेशा निर्देशक/लेखक की कहानी को जीता है या जीने को मजबूर होता है ।

अभिनय, सत्य के विपरीत होते हुए भी झूठ नही होता। क्योंकि अभिनेता उस जीवन को जितनी सच्चाई से जीता है, शायद उतनी सच्चाई सामान्य लोगों की आम जिंदगी में नही होता। अभिनेता इस तथ्य को आसानी से समझ सकते हैं । तो सत्य का एक रंग ये भी है , जो झूठ न होकर सत्य को स्थापित करता है – यही अभिनय है । जहां रंगमंच से उतरते ही कलाकार अपने स्वरूप में स्थापित हो जाता है ।
तदा द्रष्टुः स्वरूपे अवस्थानम !!! (पतंजलि योग सूत्र-1.3)

इसीलिये अवतार सबसे बड़े अभिनेता होते हैं । अपने स्वरूप को छीपाकर वो सबकुछ करते हैं जो हमें सन्मार्ग पर ले जाने जी प्रेरणा दे। इसीलिये अवतारों को मायावी भी कहा जाता है।अब जरा बात खेल-खिलाड़ी की ।

अक्सर लोग कहते हुई मिल जाएंगे कि अमुक काम खेल-भावना से करो । बहुत गजब की बात है ये खेल- भावना । मालूम नही कितने खिलाड़ी ऐसे हैं जो इस खेल-भावना को वाकई समझ पाते है । ये खेल-भावना का सत्य व पूर्ण रूप भगवान कृष्ण ने प्रकट किया – कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन !!! हार-जीत, दुःख-सुख आदि के द्वंद्व से बाहर, केवल एक अभिनय, ही खेल-भावना है । इस तरह खिलाड़ी और अभिनेता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । शायद इसीलिये वर्तमान में ये दोनों भगवान बने बैठे हैं ☺।

जैसे अभिनेता का अभिनय के कारण कई बार अस्तीत्व खो देता है , वैसे ही खिलाड़ी भी खेल-भावना भूल जाता है। एक उदाहरण – नाटक करते-करते कलाकार अपना कैरेक्टर कब खो देता है ऐसा ही एक अनुभव अभिनेता अमिताभ बच्चन बता रहे थे । वे फिल्मों में इतनी बार अपने नकली माँ-बाप के मरने पर रोये थे कि असली पिता मरे तो उनको आंसू ही नही आ रहा था …उनको समझ नही आ रहा था कि वाकई उनके पिता नही रहे । ठीक ऐसे ही अनेक खिलाड़ियों को विभिन्न अवसरों पर हमने हारने पर दुःखित होकर फुट-फुट कर रोते हुए और जीतने पर पागलों की तरह जश्न-मनाते देखा है । खेल के दौरान क्रोध और विरोधी खिलाड़ियों का अपमान – ये सामान्य बात है ।

सफल अभिनेताओं और खिलाड़ियों के लिये ही कहा गया – योगः कर्मसु कौशलम । यही बातें कृष्ण अर्जुन को कहते हैं – युद्ध (और दूसरे कर्म भी) एक खेल है जिसमें अर्जुन को केवल निमित्त बनना है क्योंकि अर्जुन भी एक खिलाड़ी या अभिनेता ही है, और अर्जुन का युद्ध करना एक नैमित्तिक कर्म है । ये है पूर्ण अहिंसा जिसको सनातन (हिंदुओं) धर्म ने अपनाया । कर्म करते हुए फलकांक्षी न होना – ये समझना बहुत कठिन है क्योंकि हमारा नैमित्तिक कर्म क्या है, ये मालूम नही । कर्म करते हुए मानसिक निर्लिप्तता ही योग है, और यही अभिनय या खेल-भावना है । यदि हत्या नैमित्तिक कर्म हो तो वो अहिंसा ही है । ॐ 💐☺

💐 JITENDRA K R /16.11.2018💐

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