शिक्षा-सूत्र -४

सत्य !!
# सत्य-आचरण की व्यवहारिक कठिनाइयां
# अर्ध-सत्य

💐 JITENDRA K R /14.11.2018💐

अभी तक हमने देखा कि कैसे ‘जान-बूझकर’ और ‘अनजाने’ में सत्य/झूठ बोलना नैतिक/अनैतिक व्यवहार को तय करता है । इस लेख में ये जानने की कोशिश करेंगे कि इन दोनों अवस्थाओं के अलावा एक प्रकार का असत्य बोलना और है जिसे हम ‘मजबूरी’ (compelled) कहते हैं । ऐसी बहुसंख्य आबादी है जो ये कहती है कि ऐसा करना या बोलना मजबूरी थी । यानी ये एक जान-बूझ कर बोला हुआ असत्य है लेकिन परिस्थितियां ऐसा बोलने पर मजबूर कर देती हैं । आज इसी तथ्य का विवेचन करेंगे ।

अक्सर जब हम बच्चों से बात करते समय ऐसी अनेक बातें छीपाते हैं जिसको हम ये समझते हैं कि ये बात इस उम्र में समझ नही आ सकती, इस कारण से झूठ बोलते हैं । वैसे ही कई बार ऐसी परिस्थिति आती है, जब लगता है सत्य बोलना अनेक समस्याओं में डाल सकता है, तब भी हम झूठ बोलने को मजबूर होते हैं । चाहे घर हो या बाहर, चाहे मित्र हो या दुश्मन, ऐसी असंख्य परिस्थितियों में हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे अवसर जरूर आते हैं जिसमें वो जान-बूझ कर (मजबूर, जैसा कि अक्सर हम कहते है) में झूठ बोलता है । इसी परिस्थिजन्य झूठ को हम अर्ध-सत्य (अभी के लिये) नाम दे लेते हैं । ऐसे ही अर्ध-सत्य के लिये किसी दार्शनिक की कोई विख्यात उक्ति है कि यदि आप एक दिन के लिये भी केवल सत्य बोलें तो आपके सारे सम्बन्ध (सामाजिक) खत्म हो जाएंगे ।

अब प्रश्न है ये है कि क्या इस प्रकार के अर्ध-सत्य (non-intentional and compelled) भी अपने मष्तिष्क/शरीर पर वैसा ही प्रभाव पैदा करता है जैसा जान-बूझ कर बोला हुआ असत्य/झूठ। तो इसका सीधा उत्तर है – जी हां , बिल्कुल ! एक पुरानी कहावत है – एक झूठ को छीपाने के लिये सौ झूठ बोलने पड़ते हैं , क्योंकि पहले झूठ के बाद आगे अनेक बोले जाने वाला झूठ मजबूरी वाला झूठ है । और यही मूल कारण है जिसमें कहा जाता है सत्यवादी जीवन ज्यादा आसान है ।

मष्तिष्क के करोड़ों न्यूरॉन को एक झूठ के लिये बेहद कठिन प्रबंधन से गुजरना होता है । तो स्वाभाविक है ज्यादा झूठ , ज्यादा तनाव को जन्म देता है । ये तनाव केवल झूठ बोलने का नही बल्कि सत्य को छुपाने या प्रकट न कर पाने के कारण भी होता है । और यही तनाव अनेक बीमारियों को जन्म देता है । यानि, जो हमने कहा – इस झूठ का भी निश्चित प्रभाव होता है , तो वो यही कारण है ।

लेकिन ऐसे अर्ध-सत्य से अनेकों बार दूसरे लोगों को आप सुखी या खुश भी करते हुए नजर आते हैं । कुछ उदाहरण हैं जब आप –
– अपने रोते हुए बच्चे को यह कहते हैं कि कल उसको ढेर सारी मिठाईयां या खिलौने देंगे जबकि आपको पता होता है ऐसा आप नही करने वाले, फिर भी सिर्फ उसकी रुलाई या आवाज को तत्कालिक रूप से बंद कराने के लिये कहते हैं ।
– अपनी नाराज पत्नि को बोलते हैं कि कल (आनेवाला) आभूषण खरीद देंगे, जबकि आप अच्छे से जानते हैं कि ऐसा आप नही करने जा रहे । ☺
– इस भय से कि घर में कलह होगा, अनेकों बातें या तो नही बताते या झूठ बताते हैं ।
– यद्यपि कि आपके पास सही कारण था कि आप आफिस लेट क्यों आये, लेकिन इस भय से कि आपका बॉस ये कारण सुने या समझे बिना आपको सजा दे सकता है, आप उससे झूठ बोलते हैं ।
– किसी चोर को कुछ लोग बेतरह पीट रहे हों, आप में दयुलता का भाव हो और आप उस चोर को पीटा जाता हुआ न देख पा रहे हों, और भीड़ को झूठ बोलकर उसकी जान बचाते हैं ।
– सामाजिक मान्यताओं के कारण आपके द्वारा किये गए किसी काम को अनुचित या हेय न कहा जाय, आप सत्य को छीपाते हैं ।

वैसे तो असंख्य कारण या परिस्थियां होती हैं जब आप झूठ बोलने के लिये खुद को मजबूर मानते हैं परन्तु उसका मुख्य कारण है – लोभ (पाने का) और भय (पाए हुए को खोने का)।

अब ऐसे झूठ से क्या निजात पाना सम्भव है ? इसका उत्तर है – पूरी तरह तो नही, लेकिन बहुत हद तक । मतलब ये हुआ कि ये मजबूरी में झूठ बोलने के बाद भी इसके दुष्प्रभाव से सीधे-सीधे तो नही बच सकते, पर इसको कम कर सकते हैं । पूरी तरह बचना भी सम्भव है, लेकिन उसका उपाय बेहद कठिन है । कभी कभी हम वो उपाय भी सोचते हैं कि कैसे कोई अमुक महापुरुष ने ऐसा झूठ बोला और वो तो सब जानता था । इस प्रकार हम अपने द्वारा बोलये हुए झूठ का बचाव कर पाते हैं । जैसे अमुक झूठ तो भगवान राम या भगवान कृष्ण ने भी बोला था । एक उदाहरण – एक कवि, भगवान कृष्ण के लिये, कहता है –

क्या सत्य ही जय के लिए,
केवल, नहीं बल चाहिए ?
कुछ बुद्धि का भी घात,
कुछ छल-छद्म-कौशल चाहिए।।

अक्सर आप जब टीवी या फ़िल्म में देखते हैं कि कोई खतरनाक खेल दिखाने वाला कलाकार खेल दिखाता है तो दर्शकों के लिये एक सूचना वाला टाइटल चलाया जाता है – ये स्टंट प्रशिक्षित कलाकारों द्वारा किया जा रहा है …..ये खतरनाक और जानलेवा हो सकते हैं, कृपया इसे घर पर कोशिश न करें ” ।
ठीक ऐसी ही बात अवतारों के सम्बंध में होती है । जिनको मष्तिष्क की इस पूरी प्रक्रिया का पूरा ज्ञान होता है, वे बड़ी आसानी से झूठ का प्रयोग कर ले जाता या सकता है ।

अनेक धर्माचार्य या ज्योतिषी इस फल को भोगने से रोकने का उपाय बताते हैं । वो भी फौरी तौर पर काम करता दीख सकता है, परन्तु हर कर्म का फलभोग होता है । ये कोई धर्माचार्य न भी बोले तो ये वैज्ञानिक सच है । क्योंकि हर कर्म की स्मृति मष्तिष्क में होती ही है और उस स्मृति के साथ ही उसके अच्छे या बुरे होने का ज्ञान भी । तो इस प्रकार कर्म-फल के जनक और प्रदाता (देनेवाले) हम स्वयं ही हैं ।

झूठ बोलना कोई कला नही है, बल्कि झूठ बोल कर उसके दुष्प्रभाव से खुद को बचा लेना जरूर कला है । लेकिन इस कला को जानना लगभग असम्भव जैसा ही है । और बिना इस कला के जाने आप सतत कर्म-चक्र (कर्माशय) से मुक्त नही हो सकते । यही कला (विज्ञान भी) अवतारों या सिद्धों (जो नगण्य ही होंगे) को मालूम होती है । इसी कला के लिये भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान सुनाया । या इसी कला के निरूपण के लिये महर्षि पातंजली ने अपने सूत्र रचे । ॐ 💐☺
💐 JITENDRA K R /14.11.2018💐

1 thought on “शिक्षा-सूत्र -४

  1. शील भूषण शर्मा's avatar
    शील भूषण शर्मा May 17, 2019 — 9:15 am

    अवतार कर्मफल भोग से मुक्त होते हैं। फिर चाहे झूठ बोलना हो, सत्य छुपाना हो अथवा वध करना हो…

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