सत्य !!
# बीमारियों की उत्पत्ति
# सत्य-निष्ठ जीवन के फायदे
# सत्य ही सुख का मूल
💐 JITENDRA K R /12.11.2018💐
अभी तक हमने सत्य के सैद्धांतिक व ब्यवहारिक पक्ष को देखा , और जिससे ये समझ आया कि सत्य का सैद्धांतिक महत्व कितना है व सत्य को पहचानने की क्षमता हर मनुष्य (सम्भवतः हर जीव ) में है । ज्यादातर समय जिसे हम अंतरात्मा की आवाज कहते हैं, वो सत्य का बोध ही होता है । प्रस्तुत लेख में ये जानने की कोशिश करेंगे कि सत्य आचरण या सत्य-युक्त जीवन जीना कितना कठिन है या कितना सुगम । या ये कठिनाई केवल एक मिथ्या है ? इसके साथ, ये भी जानेंगे कि सत्यनिष्ठ जीवन ही क्या सुख का मूल है ?
भौतिक विज्ञान में एक नियम चलता है जिसे हम जड़त्व का नियम (law of inertia) कहते हैं और जिसे न्यूटन द्वारा प्रस्तुत गति का प्रथम सिद्धांत भी कहते हैं । सामान्य बोल- चाल की भाषा में इसे आदत/अभ्यास कहा जाता है । ये केवल वाह्य प्रकृति ही नही बल्कि मानसिक जगत (विचारों) पर भी उसी शिद्दत से लागू होता है । क्योंकि आध्यात्मिक दृष्टि से भी मानसिक जगत प्रकृति का ही हिस्सा है । तो इसलिय इसे हम मानसिक जड़त्व कहते हैं । यानी जिस व्यवहार को आप बारम्बार करते हैं उसके लिये हमारे मष्तिष्क में ज्यादा से ज्यादा सूचना एकत्रित होती चली जाती है और वो व्यवहार उतना दृढ़ होता चला जाता है । ज्यादा सूचना के कारण ज्यादा से ज्यादा न्यूरल-नेटवर्क का बनना है । तो ये जड़त्व केवल दार्शनिक या बौद्धिक दर्शन नही , बल्कि शुद्ध भौतिक सच्चाई है । बहुतेरी शारीरिक बीमारियों का ये, वर्तमान में, बहुत बड़ा कारण है । शरीर के पूरे नर्वस-सिस्टम को संभालने वाले हार्मोनल-व्यवस्था में इनकी अग्रणी भूमिका होती है । हंसना, रोना, दुःखित होना, आदि एक सम्पूर्ण रासायनिक परिवर्तन वाली व्यवस्था होती है जो पहले विचारों से शुरू होती है । इसीलिये मेडिकल विज्ञान की पुरानी अवधारणा जिसमें शरीर और मन (विचार) को बीमारियों के संदर्भ में अलग-अलग देखा जाता था, वो अब पूरी तरह बदल चुका है, और फिजिकल डिजीज से निकलकर वो अवधारणा साइको-सोमेटिक कहलाने लगी है । यही वजह है कि अब एलोपैथी डॉक्टर भी मेडिटेशन, योगा-आसन आदि को स्वीकार करने लगे हैं ।
तो अब ये कहना कि विचार अभौतिक सत्ता है, गलत है । विचार वैसे ही भौतिक है जैसे हमारा भौतिक शरीर । सच या झूठ बोलने से आप शारीरिक रूप से भी सुख या कष्ट पाएंगे, ये तथ्य किसी और ग्रह का न होकर इसी पृथ्वी ग्रह का हिस्सा है । पाप-पुण्य का वैचारिक विषय हमारे भौतिक शरीर में अनेक बीमारियां पैदा करते हैं, ये कोई कोरा गप्प नही है । इसलिय जिसे आप “विश्वास” कहते हैं ,वो आपके भौतिक अस्तित्व का हिस्सा है जिसका प्रभाव आपके भौतिक शरीर पर हर क्षण पड़ता है । कुछ लोग कहते हैं यहीं स्वर्ग-नर्क है, और आप अपने अच्छे-बुरे कर्मों का फल इसी लोक में भोगते है । वे लोग कुछ हद तक सही भी बोलते हैं । हम अपने हर कर्म की स्मृति अपने मष्तिष्क में सुरक्षित रखते हैं । इसलिय हर स्मृति अपने सनातन सच्चाई के अनुसार या तो एक द्वंद्वात्मक या निर्द्वन्द्व स्मृति बनाता है । यही द्वंद्वात्मक विचार पहले हार्मोनल-व्यवस्था और बाद में अन्य शारीरिक रसायनों के बैलेंस को बिगाड़ते हैं, और जिसका अंतिम फल बीमारियां होती हैं ।
जैसे आज अनेक बिमारियों के लिये डॉक्टर सुबह टहलने, योग-ध्यान , आदि करने को कहते हैं, आगे से वे बोलेंगे – आप दिन में कम से कम पांच बार सच बोलो, जितनी बारी किसी को गाली देते हो, उसको आधा कर दो, किसी का सामान न चुराओ …☺। ये होने वाला है (तब आप हमारा ये लेख याद करिएगा ☺) जिनको अभी भी भरोसा नही होता कि आपके अच्छे बुरे कर्मों का फल भगवान देता है , उनको इतना जानना काफी है कि ये दण्ड भगवान नही हम स्वयं ही स्वयं को देते हैं । भगवान का अस्तीत्व न भी हो तो भी पाप-पुण्य का फल आपको भोगने से कोई नही रोक सकता , क्योंकि उसका दण्ड या फल आप स्वयं यानि आपका मष्तिष्क ही आपको देता है । इस प्रकार जो कहते है -आप अपने कर्मो का फल भोगते हैं, यह एक भौतिक सच्चाई है । अनेक नौतिक नियमों का पालन न करना आपको दुःख देता है । तो दुःख का कारण कहीं भी बाहर नही है, वो आपके भीतर ही बैठा है । इस तथ्य को समझने के लिये आपको कोई आध्यात्मिक रहस्य नही जानना, बल्कि ये वैसे साफ-साफ दिखना चाहिए जैसे आप खुली आँखों से अपने इर्द-गिर्द के संसार को देखते हैं ।
पुराने जमाने में वैद्य नाड़ी (pulse rate) देख कर अनेक बीमारियां जान लेते थे । कालांतर में आधुनिक विज्ञान के नित नए खोजों वाले युग में बीमारियों को पकड़ने के मशीनी संसाधन बढ़ते चले गए । थर्मामीटर, स्टेथोस्कोप से लेकर आधुनिकतम MRI मशीनें इस काम पर लग गईं । शरीर में रसायनों की मात्रा से रोगों का अनुमान लगाने में निश्चतता बढ़ती गई । बुखार या दिल की धड़कन कोई बीमारी नही है, बल्कि बीमारियों का असर इस रूप में दीखता है । ज्वर या बुखार स्वयं में कोई बीमारी नही है बल्कि शरीर में बीमारी की सूचना देने का माध्यम है जो शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता द्वारा रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं या विषाणुओं से लड़ने के कारण पैदा होता है । लेकिन इस प्रतिरोध के कारण शरीर का तापमान इतना बढ़ जाये कि सम्भव है शरीर के तंत्रिका तंत्र को नष्ट करने लगे, इसलिय एक सीमा के बाद, बुखार को रोकने का उपाय करना पड़ता है ।
उच्च/निम्न रक्त-चाप या शुगर (चीनी की कमी या अधिकता) भी बीमारियां नही, बल्कि बीमारियों की सूचना भर है । ऐसे ही तनाव या डिप्रेशन भी बीमारी नही है, बल्कि आपको अपने दिमाग को नियंत्रित करने की क्षमता खत्म होने की सूचना होती है ।
इसी तरह आप कितने नैतिक या अनैतिक जीवन जी रहे हैं, वो इस बात का प्रमाण है कि भविष्य में आप कितने बड़े बीमारी में पड़ने वाले हैं । ये आप स्वयं जान सकते हैं । इसके लिये न कोई वैद्य चाहिय, न ही कोई ज्योतिषी। ज्योतिषी या धर्माचार्य आपके गलतियों को फौरी तौर पर किसी अन्य विचार/ विश्वास को देकर ढंकने का प्रयास करते है, पर ये सारे प्रयास आज नही तो कल विफल जरूर होंगे । कभी कभी ज्योतिष दान आदि की बातें जो करते हैं , वो वास्तव में आपको एक प्रकार का धन-दण्ड या शारीरिक दण्ड होता है । जैसे ये काम हो जाएगा, 10 दिन उपवास करो, इसका अर्थ सिर्फ इतना ही है कि आपके विचारों में जो अनैतिकता के कारण शक्तिहीनता हुई है, वो एक प्रकार के शारीरिक दण्ड से सही हो जाय । और आपके विचार में परिवर्तन आये । ग्रह आदि की बातें भी इन्ही विचारों की एक कूट-भाषा है जिसको बहुसंख्य ज्योतिषी भी नही जानते ।
तो अंत इसी से करते है कि …हमारे जीवन में सुख और सफलता का सारा रहस्य नौष्ठिक जीवन जीने में ही है । जो सत्य-निष्ठ जीवन जी रहा है, उसके न केवल इसी जन्म के बल्कि पिछले जन्म के भी (यदि आप विश्वास करते हों तो), सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।
यदि असत्य दुःख का कारण है तो ये भी सही है कि …सत्य ही सुख का मूल है । ॐ 💐
💐 JITENDRA K R /12.11.2018💐
