सत्य !!!
# निरपेक्ष सत्य
# व्यवहारिक या सापेक्ष सत्य
💐 JITENDRA K R 12.11.2018💐
ज्ञान और सत्य – ये दो ऐसे शब्द हैं जो दर्शन और विज्ञान की रीढ हैं । दर्शन शास्त्र (विज्ञान और धर्म दोनों ) में इन विषयों पर वृहद और अंतहीन चर्चा की गई है। इन लेखों में हमने उस सत्य की बात की है जो सामान्य जन अपने रोजमर्रा की जिंदगी में उपयोग करते हैं । यानि ये सैद्धांतिक सत्य (निरपेक्ष सत्य) नही, बल्कि प्रायोगिक सत्य (सापेक्षिक सत्य) है । इसलिय हर बार सत्य के साथ ( ) में आचरण भी लिखा है । ये सापेक्षिक सत्य हर बुध्दि समझती है , क्योंकि वो उसी बुद्धि में विचारों का संग्रह का हिस्सा है, वो निरपेक्ष या व्रह्माण्डीय सत्य नही है ।
निरपेक्ष सत्य के बारे में दुनिया के अनेक दर्शनों में भिन्न-भिन्न प्रकार की व्याख्या की गई है । वहीं प्रायोगिक सत्य की बात दुनिया के हर धर्म के दर्शन और नीति-शास्त्र में है । यहां तक कि विज्ञान का अंतिम लक्ष्य भी ब्रह्मांडीय सत्य का उद्घाटन ही है । सारे दर्शनों के ज्ञान या तत्व मीमांसा में सत्य ही मूलाधार है । एक तरह से कहा जाय तो ज्ञान (जिज्ञासा) और सत्य का निकटम सम्बन्ध है । सापेक्ष सत्य भी निरपेक्ष सत्य तक पहुचने का मार्ग है । यानि व्यवहारिक या प्रायोगिक सत्य के लिये दो उदाहरण भारतीय धर्मों से इस प्रकार है –
पहला – भारतीय (हिन्दू) धर्म दर्शन के छः मूल दर्शनों में से एक (अष्टांग) योग-दर्शन (पतंजलि का) का पहला अंग “यम” नाम से कहा कहा गया और पांच यमों में से एक यम है – सत्य (सत्य -वादन, या सत्य बोलना) । ये ब्यवहारिक सत्य की बात है जो हर व्यक्ति का मष्तिष्क समझता है । लेकिन हिन्दू धर्म दर्शन में निरपेक्ष सत्य केवल ब्रम्ह/आत्मा/ईश्वर है। इसके अलावा प्रकृति परिवर्तनशील होने के कारण हमेशा सापेक्ष सत्य के आधार पर व्यवहार करती है । इसका ज्ञान ही परम ज्ञान है ।
दूसरा उदाहरण , विश्व के सबसे पहले संगठित धर्म यानि बौद्ध धर्म के मूल के अनुसार – चार आर्यसत्य हैं , आर्य का अर्थ यहां मूल (fundamental) या सनातन ही है । तो वे चार आर्यसत्य हैं – १. दुःख – (संसार में) दुःख है , २. समुदय – दुःख का कारण है, ३. निरोध – दुःख का निवारण है, ४. मार्ग – निवारण का उपाय (अष्टांगिक मार्ग) है । और साधारण अर्थों में अष्टांगिक मार्ग है ये –
१. सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना
२. सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना
३. सम्यक वाक : उचित बातें (झूठ नहीं) बोलना
४. सम्यक कर्म : हानिकारक कर्म न करना
५. सम्यक जीविका : कोई भी उचित (स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक नहीं) व्यापार करना
६. सम्यक प्रयास : अपने आप सुधरने की कोशिश करना
७. सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना
८. सम्यक समाधि : निर्वाण पाना
हर मार्ग में सम्यक शब्द लगा है । और सम्यक का अर्थ है – ठीक-ठीक या उचित । परन्तु उचित स्वयं में सापेक्ष शब्द होने से सम्यक का अर्थ निकलता है – देश-काल अनुसार उचित व्यवहार, यानि ये मार्ग सापेक्ष हैं ।
अब आते है सिद्धांत से हटकर पूरी तरह व्यवहार पर । हर मनुष्य ( शायद हर जीव) जन्म से ही कुछ गुण लेकर आता है, जैसे – हंसना, रोना, क्रोधित होना, दुःखी होना आदि । किस विषय में ये व्यवहार कैसे करना है, सम्भवतः वो बाद में सीखता भी है परन्तु अधिकतम ये मूल प्रवृति है । वैज्ञानिक भाषा में बोलें तो पूरी तरह जेनेटिक या आनुवांशिक है । ठीक ऐसे ही सत्य /सच पहचानने की क्षमता भी अनुवांशिक ही मान सकते हैं । सामान्य रूप से सत्य/ सच बोलने का विरोधी व्यवहार मिथ्या/झूठ बोलना है । जितने भी बौद्धिक सद्गुण नाम से नीतिशास्त्र में क्रिया कही गयी है, वो कहीं न कहीं इस सत्य/ सच बोलने से सम्बद्ध है । (मष्तिष्क में सूचना संग्रह के संदर्भ में सत्य का विवरण अगले अंक में देने की कोशिश करेंगे)
कुछ उदाहरण रोज़मर्रा की जिंदगी से लेते जिससे सत्य पहचानने की क्षमता का पता चलता है ।
सच वो है जिसे आप
– लोभ या भय के कारण छुपाने की कोशिश करते हैं ।
– करने के लिये एकांत और अंधेरे को खोजते हैं ।
– अपने छोटे से बच्चे से मुंह खुलवा कर ये पूछते हैं कि ‘सच, सच बताओ’ कि मुंह में क्या रखा है, बच्चा भी मासूमियत से बोलता है – कुछ भी नही ।
– किसी का सामान चोरी करने या किसी की हत्या करने के बाद ये बोलते हैं कि ये काम हमने नही किया ।
– दुःखी होने के बाद भी दूसरों को बताते हैं सब ठीक है ।
– लड़खड़ाते कदमो से मध्य-रात्रि में घर में घुसते ही बोलते हैं कि दोस्तों ने रोक लिया था जबकि आपने दोस्तों को रोका होता है । ☺
– टीचर के पूछने पर ये बताते हैं कि गृहकार्य इसलिय नही किया क्योंकि मैं बीमार हो गया था या घर में किसी ने कोई और काम सौंप दिया ….
– बॉस से डांट खाने पर होने वाला गुस्सा परिवार पर उतारते हैं
– अपनी अक्षमताओं को परिस्थितियों पर डालने की कोशिश करते हैं ।
– सरकार को ठीक-ठीक आय न बताते हुए या कोई कानून तोड़ते हुए
– लोभ और ईर्ष्यावश हजारों झूठ दिन-रात लोगों को बताते रहते हैं ।
– अपने ज्ञान से खुद का दुःख न दूर कर पाने पर भी दूसरों को दुःख दूर करने का ज्ञान दे रहे होते हैं …
ऐसी असंख्य बाते हैं जिससे साफ-साफ पता चलता है कि सच और झूठ आप कब बोल रहे हैं । इसमें कभी-कभी जानकारी के अभाव में आप झूठ बोलते हुए दीख सकते हैं , परन्तु उस झूठ को हम व्यवहारिक सत्य मान सकते हैं, क्योंकि आपको सत्य का ज्ञान नही है । यानि सत्य आपने जानबूझ कर बोला या अनजाने में इस बात का महत्व बहुत ज्यादा है । और ये जानना और समझना भी व्यक्ति का कर्तव्य है । आज जो ‘गति का सिद्धांत” आपने पढ़ा , सम्भव है कल वही परिवर्तित हो जाये, तो आप झूठा शिक्षक नही कहे जाएंगे । इस तरह सामान्य जन की भाषा में जान-बूझ कर (भय या लोभ के कारण भी) सच न बोलना ही धर्म या नीतिशास्त्र के अनुसार गलत/अनुचित है ।
और इसी “जान-बूझ कर सत्य” का पालन करवाना ही धर्म और नीतिशास्त्र का सन्देश है । पाप-पुण्य की भी अवधारणा इसी “जान-बूझ कर” किये गए कृत्यों से है जिसका मूल ‘सत्य’ ही है । इसीलिये व्यवहार के लिये धर्म पालन या नीतिशास्त्त का एक सीधा और सटीक सूत्र है – आप वो व्यवहार दूसरों के साथ न करें, जो स्वयं के लिये पसन्द न हो । ॐ 💐☺
(डिस्क्लेमर – ये लेख उन विद्वानों के लिये नही जिनको केवल पठन-पाठन का आनन्द लेना या देना होता है, बल्कि उसके लिये जो वाकई जिज्ञासु हैं , और इन सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारना चहते हैं । जो स्वयं ज्ञानी हैं या शास्त्रीय ज्ञान केवल अहङ्कार वश लेते-देते हैं, वे बेहतर है अनेक लिखे हुए ग्रन्थों का आनन्द लें )☺
💐 JITENDRA K R 12.11.2018💐

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