#सत्याग्रह ही शक्ति का केंद्र है
# निमित-मात्र
💐 JITENDRA K R 10.11.2018💐
युद्ध या खेल जीतना इस बात पर निर्भर करता है कि आप विपक्षी से कितने ज्यादा ताकतवर हैं । ताकतवर होना एक सापेक्षिक तथ्य है । साधारण अर्थों में आप अपनी ताकत बढ़ाएं या विपक्षी की ताकत घटाएं तो वही लक्ष्य प्राप्त होगा। लेकिन ये दोनों बातें – “अपनी ताकत बढ़ाएं”और ‘विपक्षी की ताकत घटाएं’ बिल्कुल अलग हैं । विपक्षी की ताकत घटाना न केवल आसान काम नही है क्योंकि विपक्षी भी अपनी ताकत बढ़ा रहा होगा, इसके अलावा सम्भव है कल नए विपक्षी भी आएं , तो इस तरह आपके पास अनेक और असंख्य लक्ष्य बनता चला जायेगा । अब इसके विपरीत आपने यदि खुद को मजबूत बनाने का लक्ष्य रखा तो उस लक्ष्य को समझना न केवल बेहद आसान होगा बल्कि वो आपको विपक्षी के बदलने से भी कोई फर्क नही पड़ता । हां, ताकत को बढाने के लिये विपक्षियों के ताकत से आप एक सापेक्षित मापन (relative measurement) करने में सहायता ले सकते हैं । इसीलिये, कुछ लोग कहते हैं – जरूरी नही कि दूसरे की लाइन छोटी की जाय , बल्कि प्रयास होना चाहिये कि अपनी लाइन लंबी की जाय ।
विरोधी को हराने के लिये सत्याग्रह भी एक ऐसा ही मार्ग है । सत्याग्रह का अर्थ है – सत्य (आचरण) के प्रति निश्चयात्मिका बुद्धि । यानि अपने स्वयं को सत्य के प्रति आग्रही रखते हुए तथा विरोधी के प्रति व्यक्तिगत विद्वेष की भावना न रखते हुए उसमें (विरोधी के विचार में) परिवर्तन का प्रयास करे ।
कोई भी मनुष्य जन्म से ज्ञानी या अज्ञानी नही होता । बल्कि इस संसार में आने के बाद अपने आस-पास होने वाली घटनाओं के माध्यम से ज्ञान (सामान्य व विशिष्ट) का संचय करता है । इसलिय किसी व्यक्ति के व्यवहार के लिये केवल वो व्यक्ति ही जिम्मेदार नही होता , बल्कि उसका परिवार/समाज/ राष्ट्र/ विश्व भी जिम्मेदार होता है । समाज, राष्ट्र या वैष्विक जीवन को बनाने में हर एक मनुष्य शामिल है । उसमें से कोई ज्यादा प्रभावित करता है, कोई कम, परन्तु करते सभी हैं । लेकिन ये जानना बेहद जरूरी है कि ज्यादा प्रभावित कौन करता है । तो उसका उत्तर है – सत्याग्रही । क्योंकि सत्य आत्मा का बल होता है, इसको कुछ लोग शुभ इच्छा-शक्ति कहते हैं । यदि ऐसा न होता तो समाज जितना अभी बुरा दीखता है, उससे हजार गुना बुरा होता । तो ये शुभ इच्छा-शक्ति जितनी मजबूत होती है, उतनी ताकत उस व्यक्ति के पास होती है ।
कुछ लोग कहेंगे कि कुछ बुरे विचार वाले भी इतनी शक्ति कहां से पा लेते हैं ? तो उसका उत्तर है – वे असत्य को ही सत्य समझकर पूरी निष्ठा से उसके प्रति आग्रही हो जाते हैं । वे भी सत्याग्रही ही होते हैं, लेकिन उनका सत्य , सार्वभौमिक सत्य का विरोधी होता है । इसीलिये भगवान ने भ/गी में कहा – सारी शक्तियां मुझसे ही प्राप्त होती हैं । तो असत्य को सत्य मानते हुए भी शक्ति-सम्पन्नता अर्जित की जा सकती है । रावण उसका एक उदाहरण है । इस प्रकार, राम और रावण की शक्ति का स्रोत एक ही है । असत्य का मार्ग स्वविरोधी होने से स्वंय नष्ट हो जाता है, इसलिय रावण या दुर्योधन का नाश होना तो अवस्यम्भावी होता है । इसी तात्विक सत्य ज्ञान के आधार पर कृष्ण ने अर्जुन को चुनौती दिया कि यदि अर्जुन युद्ध नही लड़ेगा तो इसका अर्थ ये नही की परिणाम बदल जायेगा , बल्कि अर्जुन तो केवल निमित्त मात्र है । तो परिणाम सिद्धांत (सत्य-आधारित) तय करते हैं, व्यक्ति नही । जीत- हार के लिये व्यक्ति तो सिर्फ निमित्त-मात्र है।
जैसे परमाणु को टूटने के लिये उसके नाभिक में रहने वाले कण ही जिम्मेदार होते हैं, वैसे ही आसुरी शक्तियों (लोगों) के नाश के लिये उसके मष्तिष्क के स्वविरोधी विचार ही जिम्मेदार होते हैं । इसतरह जो लोग युद्ध के माध्यम से शरीर के नाश के लिये अवतारों को दोषारोपण करते हैं, वे इस तथ्य को नही देख पाते कि असुरों का नाश का कारण उनके स्वविरोधी विचार ही हैं, अवतार भी सिर्फ निमित्त-मात्र है!अवतारों की शक्ति उनका सत्याग्रह है !!!
💐 JITENDRA K R 10.11.2018💐
