# शिक्षा-व्यवस्था की असफलता
# विषाद और आत्महत्या
💐 JITENDRA K R /26.04.2019💐
( Written for Comprehensive Counseling Interface, CCI)
दो दिन पूर्व हमने भारत के प्रधानमंत्री मोदी का एक इंटरव्यू सुना जिसे अभिनेता अक्षय कुमार ने संचालित किया । अनेक प्रश्नों में से एक प्रश्न – मोदी जी, क्या आपको गुस्सा नहीं आता ? या आता है तो उसको कैसे हैंडल करते हैं ? (बाद के क्रम में अक्षय ने खुद के प्रयोग को भी साझा किया कि कैसे वे पंचिंग बैग को घुसा मारकर क्रोध को शांत करते हैं ) । प्रधानमंत्री ने जो उत्तर दिया (कागज पर सब कुछ, सारे घटनाक्रम को, पहले लिखना और बाद में फाड़ कर फेंक देना ) उससे ये लगा कि उन्होंने पहले तो खुद को उंस प्रश्न से बचाने की कोशिश की , परन्तु बाद में ये सत्य प्रकट करना पड़ा। सामान्य मनोविज्ञान में कैथार्सिस की ये विधियां अनेकों लोगों को मालूम हैं कि कैसे इस क्रोध को डिफ्यूज किया जाता है । इस सम्बन्ध में मनोविज्ञान में अनेक विधियां बताई गई हैं । यहां तक कि खेल से लेकर स्वप्न , सभी कुछ इसी कैथार्सिस का हिस्सा है । अब मनिचिकित्सकों ने तनाव, स्ट्रेस या क्रोध-मैनेजमेंट जैसे अनेक कोर्स (प्रशिक्षण कार्यक्रम )भी चलाना शुरू कर दिया है ।
तो इस पृष्ठभूमि के बाद आइए जरा गहराई में इसका विचार करें …
जब हम किसी को ये कहते हैं ..
लोभ न करो, घृणा न करो, ईर्ष्या/द्वेष न करो , क्रोध से बचें…, सबको प्रेम करो, अच्छी भावना करो , …..आदि
तब क्या हमने कभी ये नहीं सोचा या समझा है कि ये भावनाएं/विचार हम जानबूझकर नहीं करते ? बल्कि ये विचार स्वतः आते हैं, एक आवेग के रूप में , जैसे कोई तूफान हो, ..। और तूफान पर कार्रवाई या विश्लेषण तब शुरू होता है , जब वो गुजर जाता है । इन आवेगों पर तब तक हम संतुलन नहीं बना सकते, जब तक इनके आगमन का भान न हो, ठीक वसे जैसे भूकम्प की पूर्व-सूचना । तो ये भावनाएं ठीक वैसे ही काम करती हैं जैसे भूकम्प के समय धरती का हाल हो । और जैसे धरती उंस भूकम्प का हिस्सा हो, ठीक वैसे ही मनुष्य का मष्तिष्क उन आवेगों के दौर में भूकम्प का हिस्सा होता है । इस तरह दोनों – पृथ्वी और मष्तिष्क, इस हालत में नहीं होते कि वो उस आवेग को रोक पाए । ऐसे में इन आवेग-युक्त मनोभावों को नैतिकता की कसौटी पर कसते हुए किसी को दोषी ठहराना और फिर उसे काबू करने के लिये अनेक प्रकार की नसीहतें देना कहां तक उचित है? महान से महान व्यक्ति भी इन आवेगों में बह जाते हैं और बाद में दूसरों को नसीहतें देते हैं । मुझे नहीं मालूम कितने ऐसे मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक हैं जो इन भावनाओं को मनोविकार का नाम नहीं देते, लेकिन वे भी ऐसे भावनाओं, जिसे लेखक मानसिक भूकम्प कहता है, के आवेग को क्या सहन कर सकते हैं?
सिद्धान्ततः, कुछेक ऐसे दृश्य/विचार जिसे आप देखना/जानना नहीं चाहते, वैसे दृश्य/विचार के प्रकट होने के परिणाम-स्वरूप मन में घृणा का भाव जागृत होता है, यह घृणा का भाव प्रतिकारी बल के रूप में मन में द्वंद्वात्मक तनाव को जन्म देता है , और यही तनाव धीरे-धीरे एक भावनात्मक भूकम्प की पृष्ठभूमि बनाता है । एक सीमा के बाद जब तनाव स्ट्रेस के रूप में जमा होने लगता है, तब एक निश्चित सीमा के बाद उसमें क्रोधात्मक आवेग पैदा होता है , और यही आवेग एक मानसिक भूकम्प में बदल जाता है । क्रोध की उत्पत्ति का वर्णन भ/गी में आया है ….ध्यायतो विषयान्पुंसः…….”* । इस श्लोक में क्रोध की उत्पत्ति का कारण इच्छित विचारों में स्वयं को शामिल करने से प्रारम्भ होता है , लेकिन फिर भी ये समझना काफी नहीं कि विषयों के चिंतन में यदि क्रोध की उत्पत्ति निहित है तो इसको रोकें कैसे । बाद में भगवान ने ध्यानादि के प्रयोग से इसे काबू करने की विधि बताई है ।
उपरोक्त सैद्धांतिक पक्ष के बावजूद, ये न केवल दुःखद किंतु चिंताजनक बात है कि समाज के हर वर्ग – किसान, विद्यार्थी, नौकरीपेशा लोग, स्त्री, आदि, के भीतर न केवल भयानक तनाव या विषाद ग्रस्तता दीख रहा है बल्कि ये तनाव अब भूकंपीय स्थिति में प्रवेश कर गया है ।
निराशा/हताशा व क्रोध की अंतिम परिणति है – आत्म-हत्या, जो एक मानसिक भूकम्पीय स्थिति है । उसी का एक उदाहरण यहां अटैच किया गया है । शिक्षा-व्यवस्था की ये सम्पूर्ण विफलता के रूप में देखा जा सकता है ।
* नोट –
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।। 2/62 ।।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।। 2/63 ।।
अर्थ- विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।
(जारी …)
💐 JITENDRA K R /26.04.2019💐
( Written for Comprehensive Counseling Interface, CCI)
