“Spirituality is no rituals, no dogmas, no mystery, no merely ideas/concepts, but is purely science of a different regime of our own existence, and is truly a science of spirit/atman, which is fully based on personal experience that is known as self-realization. This is the last goal or prime aim of a human-life.” – JKR (UM)

ईश्वर का अस्तित्व होना और उसका अनुभव करने की शर्त
JITENDRA K RAI *
ईश्वर है या नहीं ? इसका उत्तर है – हां और नहीं (दोनों)! यदि है, तो क्या उसका होने का अनुभव सम्भव है ?ईश्वर दो प्रकार का है । एक वो जिसे हमने विचारों (भावनाओं ) से बनाया/गढ़ा है, और दूसरा वो जो वास्तव में है, ठीक वैसे जैसे हमारा शरीर, मन और पूरी दृश्य प्रकृति ! ज्यादातर लोग पहले वाले ईश्वर को ही जानते हैं |दृश्य-जगत का कोई भी सिद्धांत अदृश्य को परिभाषित नहीं कर सकता । ईश्वर भी अदृश्य है, और इसलिये ईश्वर अप्रमेय है । अनासक्ति (भावना) ही ईश्वर तक पहुंचा सकता है क्योंकि प्रकृति आसक्ति के सिद्धांत पर चलती है और ईश्वर अनासक्ति के।
कोई भी भावना गलत या सही नहीं होती, देश-काल-द्रष्टा के अनुसार वो सही या गलत होती है । अनेक लोग काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, आदि भावनाओं की निंदा करते हैं लेकिन वास्तव में ये भावनाएं न तो निंदा से समाप्त होती हैं, ना ही कोई इनसे मुक्त हो पाता है, और न ही ये कभी स्वयं समाप्त हो सकती हैं । भावनाएं शुभ और अशुभ नहीं होतीं बल्कि हम प्रयोगकर्ता उसको शुभ या अशुभ बनाते हैं । एक ही तलवार युद्ध में यदि अच्छे लोगों के हाथ हो तो आतताइयों से मुक्ति दिलाती है और और यदि आतताई के हाथ हो तो उससे अनेकों लोगों को कष्ट दिलाती है ।
इस तरह भावनाओं का उपयोग करनेवाला मनुष्य “अनासक्त मनुष्य” या योगी कहा जाता है, लेकिन भावनाओं द्वारा उपयोग होने वाला मनुष्य “आसक्त मनुष्य” कहा जाता है, और इस श्रेणी में हर वो मनुष्य है जिसे सांसारी कहा जाता है । अनासक्ति का अर्थ है – भवनाओं पर विजय पाना, और जो भावनाओं को अनासक्ति के साथ उपयोग करनेवाला है, वही ईश्वर का अवतार है। ईश्वर द्वंद्व (conflict) से परे है; द्वंद्व प्रकृति का हिस्सा है । अत: जिसे ईश्वर को साक्षत्कार करना हो उसे भी द्वंद्व-मुक्त यानि अनासक्त होना पड़ेगा।
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